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नोएडा सेक्टर 150: युवराज की मौत पर मंडराते गिद्ध

नोएडा सेक्टर 150 — इतना तो आपको अब तक याद हो ही गया होगा। लेकिन आज बात इस घटना की भावनात्मक परत से बाहर निकलने कि जरूरत है। यह समझने की है कि इसे रोका कैसे जा सकता था। क्योंकि इस सवाल का कोई इमोशनल जवाब नहीं हो सकता। इसका जवाब केवल लॉजिकल आर्ग्यूमेंट हो सकता है।

अब तक आपने एक 27 साल के सॉफ्टवेयर इंजीनियर युवराज मेहता की गाड़ी का अधूरे बेसमेंट में बने 70 फीट गहरे तालाब में गिर जाना। और उसके बाद मचे बवाल के बारे में सब कुछ सुन लिया है। इस घटना के बाद प्रधानमंत्री से लेकर मुख्यमंत्री तक का इस्तीफा मांगा गया। नोएडा अथॉरिटी के सीईओ, आईएएस डॉ. लोकेश को हटा भी दिया गया है। और एसआईटी की जांच पूरी होने तक वे वेटिंग में रहेंगे।

लेकिन सवाल यह है कि क्या ऐसी घटनाओं पर हमेशा “who is responsible” का ऑर्केस्ट्रा ही बजेगा? या कभी हम असली समस्या तक भी पहुंचेंगे? या फिर हम माइक और कैमरा लेकर एक्टिविज़्म की एक्टिंग करने वाले गिद्ध पत्रकारों को ही सुधारक मानते रहेंगे?

सही सवाल कौन उठाएगा?

युवराज मेहता की मौत के बाद अब सीधे डीएम पर सवाल उठाए जा रहे हैं, क्योंकि मौके पर एसडीआरएफ पहुंची थी। चूंकि एसडीआरएफ डीएम के अंडर आती है और ऑपरेशन असफल रहा। इसलिए डीएम को जिम्मेदार ठहराना पूरी तरह गलत भी नहीं कहा जा सकता। एक बार के लिए इसे स्वीकार किया जा सकता है।

यह सुनने में अच्छा लगता है। इससे गुस्सा, जोश और जुनून पैदा होता है। और इसी भावना का फायदा गिद्ध उठाते हैं। वे आपको पीएम की फोटो दिखाएंगे। सीएम की फोटो दिखाएंगे, डीएम की फोटो दिखाएंगे, एमपी-एमएलए पर चिल्लाएंगे। लेकिन उनके बगल में खड़े उन लोगों से कभी जवाब नहीं मांगेंगे, जो ऐसी घटनाओं को रोक सकते थे।

क्योंकि गिद्धों का काम घटनाएं रोकना नहीं, तमाशा बनाना है। तमाशा ही उनका रोजगार है और तमाशा बनाने की कला ही उनकी पूंजी।

जिम्मेदारी किसकी?

अब जरा नोएडा की इस घटना को ठंडे दिमाग से सोचिए। भावनात्मक पक्ष को एक पल के लिए अलग रख दीजिए और देखिए कि वास्तव में कितने लोग इसके लिए जिम्मेदार थे।

सबसे पहली जिम्मेदारी उस प्लॉट के मालिक या उसकी देखरेख करने वाले की थी, जिसने जल से भरे गड्ढे को इंडिकेट करने के लिए कोई प्रयास नहीं किया। न कोई साइन लगाया गया, न कोई चेतावनी।

दूसरी जिम्मेदारी सेक्टर 150 के उस ब्लॉक के लिए डिज़िग्नेटेड स्टाफ, इंजीनियर, बीट कॉन्स्टेबल और उन तमाम अधिकारियों और कर्मचारियों की है, जो ग्राउंड ज़ीरो पर सरकार और प्रशासन की आंख और हाथ होते हैं।

तीसरी जिम्मेदारी स्थानीय लोगों की है, जिन्होंने निजी स्तर पर भी कभी यह नहीं सोचा कि इस गड्ढे को रात या अंधेरे में इंडिकेट करवाने के लिए कोई व्यवस्था की जाए। ध्यान देने वाली बात यह है कि जब युवराज मेहता डूब रहा था, तब पुलिस और एसडीआरएफ के साथ-साथ स्थानीय लोग भी तमाशा ही देख रहे थे।

क्योंकि गिद्धों को देखते-सुनते हम तमाशा देखने के आदी हो गए हैं। इतने आदी कि युवराज डूब रहा था और लोग बस देखते रहे।

चौथी जिम्मेदारी लोकल पुलिस स्टेशन की है। जिसने 2 जनवरी को उसी जगह ट्रक पलटने के बाद भी वहां कोई बैरिकेड, कोई बाउंड्री या कोई रिफ्लेक्टर नहीं लगाया। यही पुलिस अगर यह जान ले कि सेक्टर 150 के A-3 ब्लॉक में लड़के बिना हेलमेट बाइक चला रहे हैं। तो अगले ही दिन वहां पुलिस की परमानेंट पोस्टिंग हो जाती है।

लोकल पुलिस स्टेशन को यह नहीं पता चला कि वहां 70 फीट गहरा गड्ढा है। लेकिन उसे यह जरूर पता होगा कि सेक्टर में कितने लोगों के स्टॉल लगते हैं और उनसे उगाही कहां करनी है।

लेकिन क्या आपने कभी इन चार कैटेगरी के लोगों पर सवाल किया? क्या गिद्धों ने आपका ध्यान इनकी ओर जाने दिया? या आप कुर्सी हिलाने में ही लगे हुए हैं?

नोएडा कि घटना एक collective failure

आप मुख्यमंत्री का इस्तीफा मांग सकते हैं या प्रधानमंत्री से सवाल पूछ सकते हैं। डीएम को भी खूब सुना सकते है। लेकिन सच्चाई की धरातल पर आकर यह सोचने की जरूरत है कि गड्ढा भरना प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, डीएम या एमपी-एमएलए का काम है? या उस विशेष इलाके के लिए नियुक्त अधिकारियों का? क्या यह एक कम्युनिटी फेल्योर नहीं है? क्योंकि हम सबको लगता है कि हादसा हमारे साथ नहीं होगा।

उत्तर प्रदेश की इकॉनॉमी और लॉ एंड ऑर्डर का ग्राफ कितना ऊपर जा रहा है। यह अलग से बताने की जरूरत नहीं है। भारत की इकॉनॉमी वैश्विक संकट के बावजूद ग्रोइंग और स्ट्रॉन्गेस्ट बनी हुई है। भारत के युवा, महिलाएं, किसान और जवान नई नीतियों और मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति से सशक्त हो रहे हैं। भारत की डिफेंस क्षमता और ग्लोबल पावर भी बढ़ी है।

लेकिन ऐसी दुखद और गंभीर घटनाएं सब कुछ बराबर कर देती हैं। फिर भी इसे रोकना मोदी और योगी का काम नहीं है। देश के प्रधानमंत्री जीप लेकर गड्ढों की पेट्रोलिंग नहीं करेंगे। सवाल यह है कि यह सच सुनाए कौन और यह सवाल उठाए कौन?

पत्रकार का वेश बनाकर घूमने वाले गिद्धों ने सेंसेशनल सवालों और इमोशनल मोनोलॉग से माहौल बना रखा है। अभी इनके व्यूज़ आने दो। इन्हें सरकार गिराने दो। सब्सक्राइबर बढ़ाने दो। कुर्सी हिलाने दो। असली समस्या क्या है? उसे कोने में पड़े रहने दो। उस पर हम फिर कभी बात कर लेंगे।

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