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21वीं सदी में वैश्विक स्तर पर युद्ध के बदलते स्वरूप

21वीं सदी में शक्ति संघर्ष का स्वरूप बहुत तेजी से बदल रहा है। अब विभिन्न देशों के बीच संघर्ष तोप, मिसाइल एवं सेनाओं के माध्यम से नहीं लड़े जा रहे हैं, बल्कि तकनीकी उपलब्धता, मुद्रा नियंत्रण, पूंजी प्रवाह, खाद्य सुरक्षा, आँकड़ों का संग्रहण, नियम निर्माण को प्रभावित करने की क्षमता एवं वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला को प्रभावित करने के माध्यम से लड़ा जा रहा है।

यह एक ऐसा बहुपरत, निरंतर, संस्थागत एवं सूक्ष्म युद्ध का स्वरूप है, जो राष्ट्र की आर्थिक सामरिक स्वायत्तता को बिना पारंपरिक लड़ाई के नष्ट करने की क्षमता रखता है। यह युद्ध वैश्विक बाज़ारवादी शक्तियों अर्थात बहुराष्ट्रीय कंपनियों, वॉल स्ट्रीट पर आधारित वित्तीय नेटवर्क, डॉलर आधारित भुगतान प्रणाली, अंतरराष्ट्रीय संस्थानों (विश्व व्यापार संगठन, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व बैंक), रेटिंग संस्थानों, बड़े तकनीकी संस्थानों एवं निजी सैन्य परामर्श समूहों द्वारा मिलकर संचालित किया जा रहा है। यह युद्ध एक प्रणाली है, कोई एकल घटना नहीं।

व्यवस्थित तरीके से लड़े जाने वाले उक्त वर्णित युद्ध में रणनीतिक तंत्र का उपयोग किया जाता है। इस तंत्र के माध्यम से वैश्विक बाजारवादी शक्तियाँ मिलकर किसी राष्ट्र की अर्थव्यवस्था, नीति संरचना, मुद्रा, पूंजी प्रवाह, तकनीक, आपूर्ति श्रृंखला, खाद्य सुरक्षा एवं सामाजिक धारणा पर लंबे समय तक अपना प्रभाव एवं नियंत्रण स्थापित कर लेती हैं। यह युद्ध अदृश्य रूप से चलता है और किसी को प्रत्यक्ष रूप से दिखाई नहीं देता।

यह युद्ध विभिन्न संस्थानों के माध्यम से लड़ा जाता है और इसके माध्यम से किसी भी देश की शासन व्यवस्था को भी परिवर्तित किया जा सकता है। हाल के समय में उक्त वर्णित अदृश्य युद्ध के माध्यम से बांग्लादेश, नेपाल, श्रीलंका आदि देशों में सत्ता परिवर्तन किया गया है। भारत में भी इस तरह के प्रयोग अदृश्य रूप से किए जा रहे हैं, परंतु भारतीय नागरिकों पर इस चाल का अभी तक कोई असर नहीं हुआ है क्योंकि भारत में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे सामाजिक संगठन नागरिकों के बीच अपनी प्रभावी भूमिका निभाते हुए दिखाई दे रहे हैं।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अमेरिकी डॉलर की तुलना में भारतीय रुपए की कीमत को कम करने के भरसक प्रयास हो रहे हैं। भारतीय शेयर बाजार से विदेशी निवेशकों द्वारा भारी मात्रा में अपना निवेश लगातार निकाला जा रहा है, जिससे अमेरिकी डॉलर का भारत से बाहर प्रवाह भारी मात्रा में हो रहा है और भारतीय रुपए पर दबाव बन रहा है। भारत में विभिन्न उत्पादों के होने वाले आयात महंगे हो रहे हैं, इससे अंततः भारत में मुद्रास्फीति की दर में वृद्धि हो सकती है और भारतीय नागरिकों में वर्तमान सत्ता के विरुद्ध असंतोष का भाव जाग सकता है।

परंतु केंद्र सरकार की नीतियों के चलते अभी तक मुद्रास्फीति की वृद्धि दर पर नियंत्रण बनाए रखने में सफलता मिली है एवं भारतीय खुदरा निवेशकों, म्यूचुअल फंड एवं देशी संस्थागत निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार में पर्याप्त मात्रा में अपना निवेश बढ़ाया है, जिससे भारतीय शेयर बाजार में भारी गिरावट को सफलतापूर्वक रोका जा सका है। अमेरिकी केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व द्वारा फेड रेट में वृद्धि करने से भी अमेरिकी डॉलर अंतरराष्ट्रीय बाजार में मजबूत होता है क्योंकि अमेरिका में ब्याज दरों में वृद्धि होने से वैश्विक स्तर पर उभरती अर्थव्यवस्थाओं से अमेरिकी डॉलर का निवेश निकलकर अमेरिका की ओर आकर्षित होने लगता है।

इससे भी इन देशों की मुद्राओं पर दबाव निर्मित होने लगता है। अतः ब्याज दरों में वृद्धि को भी एक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। तीसरे हथियार के रूप में किसी भी देश की मुद्रा को SWIFT जैसे भुगतान नेटवर्क से अलग कर दिया जाना है। इस निर्णय से संबंधित देश की मुद्रा का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लेन-देन नकारात्मक रूप से प्रभावित होने लगता है, जैसे रूस की मुद्रा रूबल के साथ हाल के समय में हुआ था। उक्त समस्त निर्णयों से किसी भी देश की मुद्रा को अंतरराष्ट्रीय बाजार में कमजोर किया जा सकता है, जिससे उस देश में उत्पादों के आयात महंगे हो सकते हैं, उस देश पर विदेशी कर्ज का भार बढ़ सकता है एवं उस देश का आर्थिक विकास प्रतिबंधित हो सकता है। यह युद्ध संरचनात्मक अधीनता पैदा करता है।

इसी तरह का दबाव कुछ देशों पर तब डाला जाता है जब वे किसी अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थान (विश्व बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, रेटिंग संस्थान) से ऋण लेने का प्रयास करते हैं। इन संस्थानों द्वारा इन देशों पर टैक्स की दरें बढ़ाने, अपने खर्चों पर नियंत्रण स्थापित करने, राजस्व संबंधी निर्णयों पर अपनी नीति थोपने, उस देश के ऊर्जा, बंदरगाह एवं खनन क्षेत्रों का निजीकरण करने के प्रयास करना एवं इसके माध्यम से उस देश में चुपचाप शासन परिवर्तन के प्रयास करना भी शामिल हैं।

इन संस्थानों से कर्ज लेना आधुनिक गुलामी का सबसे व्यवस्थित मॉडल बन पड़ा है। इसके साथ ही विभिन्न देशों के साथ व्यापार युद्ध भी छेड़ा जाता है। जैसे अमेरिका द्वारा ब्रिक्स (भारत, चीन, रूस, ब्राजील) पर 500 प्रतिशत टैरिफ लगाने के प्रयास करना भी इन देशों के विरुद्ध एक छद्म युद्ध छेड़ने जैसा ही निर्णय है। इन्हीं उपायों में कुछ देशों को निर्यात प्रतिबंधित करना भी इसी नीति का एक हिस्सा है।

जैसे अमेरिका एवं चीन द्वारा अन्य देशों को सेमीकंडक्टर, चिप एवं 5G उपकरणों के निर्यात पर रोक लगाई गई थी ताकि प्रभावित किए जाने वाले देशों में इन तकनीकों का उपयोग असंभव हो सके और इन देशों का विकास रुक जाए। इसी प्रकार के प्रयासों में किसी देश के कृषि क्षेत्र की नीतियों को प्रभावित कर उस देश में खाद्य पदार्थों की उपलब्धता को कम करना भी शामिल है ताकि उस देश के नागरिक अपने देश की सरकार के खिलाफ उठ खड़े हों।

जैसे हाल ही में अमेरिका द्वारा भारत के साथ मुक्त व्यापार समझौते को संपन्न करने के लिए भारत पर दबाव बनाया जा रहा है कि भारत अपने कृषि एवं डेयरी क्षेत्र को अमेरिकी उत्पादों के लिए खोल दे। इससे अमेरिकी उत्पाद सस्ती दरों पर भारत में उपलब्ध हो जाएंगे एवं भारत के किसानों द्वारा उत्पादित खाद्य पदार्थ सस्ते अमेरिकी उत्पादों की प्रतिस्पर्धा में टिक नहीं पाएंगे। इससे भारतीय कृषि एवं डेयरी क्षेत्र बर्बादी के कगार पर पहुँच जाएगा और भारतीय किसान सरकार के विरुद्ध उठ खड़ा होगा। कुल मिलाकर इस तरह के प्रयास उभरती अर्थव्यवस्थाओं की उत्पादन क्षमता प्रभावित करने के लिए भी किए जाते हैं ताकि ये देश विभिन्न उत्पादों का उत्पादन अपने देश में नहीं कर सकें और इसके लिए अन्य देशों से आयात पर इनकी निर्भरता बढ़ जाए।

प्रौद्योगिकी क्षेत्र को प्रभावित करते हुए भी कुछ देश उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं को दबाव में लाने का प्रयास करते हुए दिखाई दे रहे हैं। दरअसल तकनीक आज का नया परमाणु हथियार है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, क्वांटम, सेमीकंडक्टर, साइबर आदि भी आज युद्ध के क्षेत्र बन चुके हैं। अमेरिका ने चीन को किए जाने वाले चिप के निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया था, इससे जिन उत्पादों के निर्माण में चिप का प्रयोग होता है, उन उद्योगों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ा था। इसी प्रकार अमेरिका द्वारा भारत पर डेटा नियंत्रण हेतु दबाव बनाने का प्रयास किया जा रहा है।

पेटेंट एवं लाइसेंसिंग पर नियंत्रण एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर की बड़ी कंपनियों द्वारा नागरिक डेटा का दुरुपयोग किया जाना भी इसी युद्ध कला का एक हिस्सा है। पूरे विश्व में फैली कोविड महामारी के पश्चात वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला एक भू-राजनीतिक हथियार बन चुकी है। उदाहरण के लिए फार्मा क्षेत्र में उपयोग होने वाले कच्चे माल को चीन नियंत्रित करता है। इसी प्रकार मूल्यवान खनिज पदार्थों के 90 प्रतिशत भाग के उत्पादन पर चीन का कब्जा है। खाद्य तेल की आपूर्ति पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों का नियंत्रण है। समुद्री मार्गों पर कुछ देशों का कब्जा है, जो कई बार इस संबंध में अंतरराष्ट्रीय कानूनों को मानने से इंकार कर देते हैं। इस तरह के व्यवहार से तेजी से विकास कर रही अर्थव्यवस्थाएँ निर्भरता की कैद में धकेल दी जाती हैं।

आजकल झूठे विमर्श गढ़ने का कार्य भी बड़े जोरों पर किया जा रहा है। इसे बौद्धिक युद्ध की श्रेणी में रखा जा सकता है, जो प्रायः वैश्विक मीडिया द्वारा लड़ा जा रहा है। गैरसरकारी संस्थान (NGO) एवं थिंक टैंक एक संगठित नैरेटिव इकोसिस्टम बनाते हैं। जैसे भारत के संदर्भ में गढ़े जाने वाले कुछ झूठे विमर्शों में शामिल हैं—भारतीय किसान अक्षम हैं, भारत के स्थानीय बीज पोषणहीन हैं, भारत का देशी खाद्य मॉडल पिछड़ा है, ब्रिक्स राजनीतिक रूप से अस्थिर देशों का संगठन है, डी-डॉलराइजेशन एक असंभव कार्य है।

कुल मिलाकर उक्त वर्णित छद्म युद्ध का प्रमुख उद्देश्य अन्य देशों का मानसिक एवं बौद्धिक उपनिवेशीकरण करना है। इसके अंतर्गत इन देशों के नीति निर्धारण पर अपना आधिपत्य स्थापित करना है। इन देशों द्वारा किस प्रकार के उत्पादों का उत्पादन किया जाएगा (बीज से लेकर दवा तक) एवं इसकी आपूर्ति बाजार पर अपना नियंत्रण स्थापित करना है। साथ ही देश के मुद्रा बाजार पर नियंत्रण स्थापित करना है ताकि उस देश की मुद्रा अमेरिकी डॉलर पर निर्भर हो जाए।

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