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कानून व्यवस्था और आर्थिक प्रगति को मजबूत करने के शतत प्रयास में है ‘योगी मॉडल’ की सफलता

लगभग एक दशक पहले तक उत्तर प्रदेश का नाम राष्ट्रीय परिदृश्य में जिस संदर्भ में लिया जाता था, वह उसके विशाल भूगोल या सांस्कृतिक वैभव से अधिक उसकी कानून व्यवस्था और प्रशासनिक चुनौतियों से जुड़ा होता था।

राज्य के भूगोल और मानव संसाधन के कारण उद्योग जगत में यह धारणा तो थी कि राज्य में अपार संभावनाएं हैं, परंतु वह माफिया प्रभाव, अवैध कब्जों और राजनीतिक संरक्षण के कारण निवेश करने से डरता था।

निवेशक जनसंख्या, बाजार और श्रमशक्ति को अवसर के रूप में देखते थे, किंतु साथ ही उन्हें आशंका रहती थी कि क्या उनकी परियोजनाएं बिना व्यवधान आगे बढ़ पाएंगी? क्या भूमि, सुरक्षा और प्रशासनिक अनुमतियों से जुड़े प्रश्न सहजता से सुलझेंगे? लंबे समय तक यही अस्थिरता प्रदेश के विकास की गति को रोकती रही।

इसी पृष्ठभूमि में जब आज उत्तर प्रदेश की अर्थव्यवस्था देश में तीसरे स्थान पर पहुंचती दिखाई दे रही है और उसका आकार 36 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान व्यक्त किया जा रहा है, तो यह परिवर्तन केवल सांख्यिकीय वृद्धि नहीं बल्कि शासन और प्रशासन में आए गहरे बदलाव का परिणाम है। योगी आदित्यनाथ सरकार के नौ वर्षों में प्रदेश ने न सिर्फ अपराध और अव्यवस्था को कम किया है, बल्कि प्रशासनिक सुधार के चलते विकास और निवेश के लिए अनुकूल वातावरण तैयार कर, अर्थव्यवस्था को देश में तीसरे स्थान तक पहुंचा दिया है। इसका परिणाम यह हुआ है कि प्रदेश ने अपने विशाल आर्थिक और सामाजिक संभावनाओं को नई उड़ान दी है।

वर्ष 2016-17 में उत्तर प्रदेश की अर्थव्यवस्था लगभग 13.30 लाख करोड़ रुपये थी। उस समय राज्य की पहचान अधिकतर कृषि प्रधान और जनसंख्या के दबाव से जूझते प्रदेश के रूप में होती थी। अगले आठ से दस वर्षों में जो परिवर्तन हुआ, उसने राज्य के परिप्रेक्ष्य में अर्थव्यवस्था की परिभाषा को व्यापक बना दिया। वर्ष 2024-25 तक प्रदेश की अर्थव्यवस्था का आकार सवा 30 लाख करोड़ रुपये से अधिक हो गया और वर्ष 2025-26 में 36 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान है। लगभग एक दशक में तीन गुना विस्तार अपने आप में एक संरचनात्मक परिवर्तन की कहानी कहता है। 


इस बदलाव की जड़ें प्रशासनिक व्यवस्था में आवश्यक परिवर्तन में दिखाई देती हैं। योगी आदित्यनाथ पिछले लगभग चार दशकों में पहले ऐसे मुख्यमंत्री के रूप में स्वीकार किए गए जिनके नेतृत्व में शासन और प्रशासन ने अपनी और प्रदेश की प्राथमिकताओं को स्पष्ट किया। परिणामस्वरूप यह समझ विकसित की गई कि उत्तर प्रदेश जैसे राज्य के लिए योजनाओं की घोषणा पर्याप्त नहीं, और आवश्यक था उनका समयबद्ध और पारदर्शी क्रियान्वयन। निर्णय प्रक्रिया को तेज करने के लिए डिजिटल प्लेटफार्म विकसित किए गए, निवेश प्रस्तावों के लिए सिंगल विंडो व्यवस्था को प्रभावी बनाया गया और विभागों के बीच समन्वय की प्रणाली मजबूत की गई। पहले जिन प्रक्रियाओं में महीनों लग जाते थे, उन्हें निर्धारित समयसीमा में निपटाने का लक्ष्य रखा गया। 


प्रशासनिक तंत्र को परिणाम आधारित मूल्यांकन से जोड़ा गया। इससे उद्योग और निवेशकों के बीच शासन की विश्वसनीयता बढ़ी और निवेशकों के मन में यह विश्वास जगा कि राज्य केवल आमंत्रण नहीं दे रहा, बल्कि अनुकूल वातावरण भी सुनिश्चित कर रहा है।

राज्य की कानून व्यवस्था में सुधार इस पूरी प्रक्रिया की आधारशिला बना, लंबे समय तक उत्तर प्रदेश की सबसे बड़ी चुनौती संगठित अपराध और प्रभावशाली आपराधिक नेटवर्क रहे थे। उद्योग जगत के लिए सबसे बड़ी चिंता सुरक्षा और स्थिरता थी। राज्य ने अवैध कब्जों और अपराध के विरुद्ध कठोर कार्रवाई की, अवैध संपत्तियों को जब्त किया और पुलिस तंत्र को अधिक जवाबदेह बनाया।

उसका परिणाम यह है कि आज उत्तर प्रदेश में कानून का राज केवल नारा नहीं बल्कि व्यवहार में दिखाई देने लगा है। इससे सामाजिक वातावरण में बड़ा बदलाव आया, छोटे व्यापारियों से लेकर बड़े उद्योगपतियों तक, सभी को यह भरोसा मिला कि नियमों के भीतर रहकर काम करने वालों को संरक्षण मिलेगा। और यही भरोसा आर्थिक गतिविधियों के विस्तार की पहली शर्त होता है।

रिजर्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार भारत की कुल अर्थव्यवस्था में आज उत्तर प्रदेश का योगदान 9.1 प्रतिशत तक पहुंच चुका है। महाराष्ट्र और तमिलनाडु के बाद तीसरे स्थान पर पहुंचना इस बात का प्रमाण है कि राज्य ने केवल जनसंख्या के बल पर नहीं बल्कि उत्पादन और सेवा क्षेत्र के विस्तार के माध्यम से अपनी स्थिति मजबूत की है।

कर्नाटक और गुजरात जैसे स्थापित औद्योगिक राज्यों को पीछे छोड़ना आसान नहीं था, किंतु यह उपलब्धि बताती है कि उत्तर प्रदेश ने विकास की दौड़ में अपनी गति तेज की है। प्रति व्यक्ति आय के आंकड़े भी इसी दिशा की पुष्टि करते हैं। वर्ष 2016-17 में जहां यह 54564 रुपये थी, वहीं वर्ष 2024-25 में 109844 रुपये तक पहुंच गई और वर्ष 2025-26 में 120000 रुपये होने का अनुमान है। राष्ट्रीय औसत अभी भी अधिक है, परंतु वृद्धि की दर इस बात का संकेत है कि आय का आधार विस्तृत हो रहा है। जिन परिवारों की मासिक आय कभी 5 हजार रुपये के आसपास थी, वे अब दस हजार रुपये के स्तर तक पहुँच रहे हैं। छोटे शहरों और कस्बों में उपभोग के पैटर्न में परिवर्तन इसका प्रमाण हैं। कुछ वर्ष पहले तक राज्य में 15000 से कम कारखाने पंजीकृत थे, आज यह संख्या 30000 से अधिक हो चुकी है। इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण के क्षेत्र में उत्तर प्रदेश ने राष्ट्रीय स्तर पर अग्रणी भूमिका हासिल की है।

देश में बनने वाले कुल मोबाइल फोन का लगभग 55 प्रतिशत उत्पादन इसी राज्य में हो रहा है। नोएडा और ग्रेटर नोएडा वैश्विक कंपनियों के उत्पादन केंद्र बन चुके हैं। इन इकाइयों के आसपास सहायक उद्योगों, पैकेजिंग, परिवहन और सेवा क्षेत्र का विस्तृत नेटवर्क विकसित हुआ है।

इससे प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार के अवसर बढ़े हैं और स्थानीय अर्थव्यवस्था को गति मिली है। राज्य का वार्षिक बजट 8.33 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचना भी इस आर्थिक विस्तार का द्योतक है। 

आज प्रदेश का बड़ा बजट केवल व्यय का संकेत नहीं बल्कि निवेश की क्षमता और विकास परियोजनाओं की व्यापकता का प्रतीक है। एक्सप्रेसवे नेटवर्क का विस्तार, नए हवाई अड्डों का निर्माण, मल्टी मॉडल लॉजिस्टिक्स पार्क और औद्योगिक गलियारों की स्थापना ने प्रदेश को भौगोलिक रूप से जोड़ते हुए आर्थिक रूप से भी एकीकृत किया है। पूर्वांचल, बुंदेलखंड और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बीच कनेक्टिविटी बढ़ने से क्षेत्रीय असमानताओं को कम करने की दिशा में कदम बढ़ा है।

रणनीतिक दृष्टि से उत्तर प्रदेश डिफेंस इंडस्ट्रियल कॉरिडोर राज्य की औद्योगिक पहचान को नया आयाम देता है। लखनऊ, कानपुर, झांसी, अलीगढ़, चित्रकूट और आगरा को जोड़ने वाली यह पहल रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भरता के राष्ट्रीय लक्ष्य से जुड़ी है। ब्रह्मोस मिसाइल निर्माण इकाई की स्थापना ने राज्य को उच्च प्रौद्योगिकी आधारित रक्षा उद्योग के मानचित्र पर स्थापित किया है, इससे न केवल सामरिक क्षमता मजबूत होती है बल्कि उच्च कौशल आधारित रोजगार और अनुसंधान के अवसर भी पैदा होते हैं।

रक्षा क्षेत्र में निवेश का अर्थ है दीर्घकालिक औद्योगिक पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण जिसमें लघु और मध्यम उद्योगों की भी भागीदारी होती है। 

कृषि क्षेत्र में उत्तर प्रदेश ने अपनी पारंपरिक ताकत को आधुनिक उत्पादकता से जोड़ा है। गेहूँ, धान, गन्ना, आलू, केला, आम, अमरूद और आंवले के उत्पादन में अग्रणी रहना खाद्य सुरक्षा में महत्वपूर्ण योगदान है।

दूध उत्पादन 388 लाख मीट्रिक टन से अधिक होना ग्रामीण अर्थव्यवस्था की मजबूती का संकेत है। कृषि आधारित उद्योगों और खाद्य प्रसंस्करण इकाइयों के विस्तार से किसानों को बाजार से बेहतर जुड़ाव मिला है,  इससे आय के स्रोतों में विविधता आई है और ग्रामीण क्षेत्रों में आर्थिक गतिविधियां बढ़ी हैं। 

पर्यटन भी राज्य की अर्थव्यवस्था का सशक्त स्तंभ बनकर उभरा है। 156 करोड़ से अधिक आगंतुकों का आगमन केवल सांख्यिकीय उपलब्धि नहीं बल्कि सांस्कृतिक पूंजी के आर्थिक रूपांतरण का उदाहरण है। अयोध्या, काशी, मथुरा और प्रयागराज जैसे धार्मिक और आध्यात्मिक केंद्रों के विकास ने स्थानीय व्यापार, होटल उद्योग, परिवहन और हस्तशिल्प को नई ऊर्जा दी है। पर्यटन के माध्यम से सेवा क्षेत्र का विस्तार हुआ है और स्थानीय समुदायों को प्रत्यक्ष लाभ मिला है। 

यदि इस पूरे परिवर्तन को एक वाक्य में समेटा जाए तो कहा जा सकता है कि योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली सरकार ने उत्तर प्रदेश में शासन के चरित्र को मूल रूप से बदल दिया है। प्रशासनिक उत्कृष्टता, सुदृढ़ कानून व्यवस्था और निवेश उन्मुख नीतियों के संयोजन ने विकास की एक नई धारा प्रवाहित की है। जो राज्य कभी अनिश्चितता और अव्यवस्था की छवि के कारण निवेशकों को हिचकिचाने पर मजबूर करता था, वही आज भरोसे और अवसरों का केंद्र बनकर उभर रहा है। 


यह बदलाव केवल वर्तमान की उपलब्धि नहीं बल्कि भविष्य की व्यापक संभावनाओं का संकेत है। योगी सरकार के 9 वर्षों के कार्यकाल ने यह सिद्ध किया है कि स्पष्ट दृष्टि, दृढ़ इच्छाशक्ति और संगठित प्रयासों के बल पर दशकों पुरानी धारणाएँ बदली जा सकती हैं और विकास की कहानी नए आत्मविश्वास के साथ लिखी जा सकती है।दुनिया भर में आर्थिक प्रगति का इतिहास सरकारों की निरंतरता की कहानी है। पिछले नौ वर्षों में योगी सरकार ने इस मोर्चे पर जो सफलता अर्जित की है, उसे आगे बढ़ाने के लिए आवश्यक यह है कि सफल योजनाओं की नींव पर एक मजबूत इमारत बने।

यह काम सफलतापूर्वक हो सकेगा तो योगी आदित्यनाथ सरकार के लिए राज्य को एक बिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने के महत्वाकांक्षी लक्ष्य को प्राप्त करना असंभव दिखाई नहीं देता।

लेखक अभिषेक सिंह राजनीतिक विश्लेषक और शोधकर्ता हैं। वह मीडिया, शासन और जनमत के आपसी संबंधों का अध्ययन करते हैं। वह मुख्यत: ग्राउंड जीरो के नैरेटिव, राजनीतिक परिवर्तन और देश के विकसित होते लोकतंत्र पर लेख लिखते हैं।

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