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उत्तरदायी राष्ट्र सूचकांक: वैश्विक शासन के नए नैतिक मानदंड की शुरुआत

भारत में उत्तरदायी राष्ट्र सूचकांक का निर्माण किया गया है। इसका उद्देश्य देशों के नागरिकों और समाज के प्रति उत्तरदायित्व का मूल्यांकन करना है। 20 जनवरी 2026 को नई दिल्ली में इस सूचकांक का लोकार्पण किया गया। यह पहल शक्ति या समृद्धि के बजाय उत्तरदायित्व को केंद्र में रखती है।

हिंदू सनातन संस्कृति के संस्कारों में समाज के प्रति उत्तरदायित्व के निर्वहन के लिए नागरिकों को जागरूक किए जाने का प्रयास लगातार किया जाता रहा है। पश्चिमी सभ्यता के विपरीत, यहाँ केवल अधिकारों के भाव को बढ़ावा नहीं दिया जाता। हिंदू वेदों एवं पुराणों के अनुसार प्रत्येक राजा का प्रथम कर्तव्य है कि वह अपने राज्य में निवास कर रहे नागरिकों की समस्याओं को दूर करे। इसका उद्देश्य यह है कि नागरिक सुख-शांति और प्रसन्नता के साथ जीवन व्यतीत कर सकें।

पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी ने “एकात्म मानववाद” के सिद्धांत को विकसित किया था। यह सिद्धांत व्यक्ति एवं समाज के बीच संतुलित संबंध स्थापित करने पर बल देता है। इसका उद्देश्य प्रत्येक मानव को गरिमापूर्ण जीवन प्रदान करना और अंत्योदय के माध्यम से समाज के अंतिम व्यक्ति तक विकास का लाभ पहुँचाना है।

आज के संदर्भ में इस सिद्धांत का अर्थ यह है कि सरकारी योजनाओं का लाभ समाज के अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति तक पहुँचना चाहिए। पश्चिमी सभ्यता पूंजीवाद आधारित नीतियों पर आधारित है, जहाँ व्यक्ति केवल अपने हितों और भौतिक विकास पर केंद्रित रहता है। इससे परिवार और समाज के प्रति जिम्मेदारी का भाव कमजोर पड़ता है।

उत्तरदायी राष्ट्र सूचकांक: अवधारणा और विमोचन

उत्तरदायी राष्ट्र सूचकांक का निर्माण भारतीय प्रबंधन संस्थान, मुंबई और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली ने मिलकर किया है। इसके निर्माण में तीन वर्षों तक कार्य किया गया। इसमें वैश्विक बुद्धिजीवी संस्थानों का भी सहयोग लिया गया।

154 देशों से 2023 तक के आंकड़े एकत्र किए गए। इन आंकड़ों का विश्लेषण करने के बाद सूचकांक तैयार किया गया। डेटा विश्व बैंक, संयुक्त राष्ट्र संघ, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व स्वास्थ्य संगठन और खाद्य एवं कृषि संस्थान जैसे संस्थानों से लिया गया है।

GDP मॉडल की सीमाएँ और नए दृष्टिकोण की आवश्यकता

वर्तमान में देशों की आर्थिक प्रगति को सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर से मापा जाता है। यह मॉडल पूंजीवाद आधारित है और कृषि, उद्योग तथा सेवा क्षेत्र के उत्पादन को जोड़कर आकलन करता है।

इस मॉडल में कई कमियाँ हैं। यह आर्थिक असमानता, गरीबी, मुद्रास्फीति, बेरोजगारी और वित्तीय समावेशन जैसे विषयों पर पर्याप्त ध्यान नहीं देता। इसलिए कई देशों में नए विकास मॉडल की मांग बढ़ रही है।

उत्तरदायी राष्ट्र सूचकांक और भारतीय दृष्टिकोण

भारतीय सनातन संस्कृति के अनुसार आर्थिक प्रगति तभी सार्थक है जब अंतिम नागरिक तक उसका लाभ पहुँचे। वर्तमान GDP मॉडल में यह सुनिश्चित नहीं होता, जिससे गरीब और अधिक गरीब तथा अमीर और अधिक अमीर होते जा रहे हैं।

उत्तरदायी राष्ट्र सूचकांक यह मूल्यांकन करता है कि शासन प्रणाली नैतिक दृष्टिकोण से नीतियाँ कैसे बनाती है। यह समावेशी विकास, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय दायित्वों तथा नैतिक शासन पर केंद्रित है। इसमें भारतीय सभ्यता के सदाचार आधारित सिद्धांतों को भी शामिल किया गया है।

पश्चिमी और भारतीय सभ्यता का तुलनात्मक दृष्टिकोण

पश्चिमी देशों की अर्थव्यवस्थाएँ तेज़ी से बढ़ी हैं और कई देश विकसित श्रेणी में आ गए हैं। परंतु इनमें मानवतावादी दृष्टिकोण का अभाव देखा जाता है। पूंजीवाद आधारित व्यवस्था में “मैं” का भाव प्रमुख होता है, जिससे परिवार और समाज पीछे छूट जाते हैं।

इसका परिणाम सामाजिक ताना-बाना के विघटन के रूप में सामने आया है। अमेरिका में लाखों बुजुर्ग खुले आसमान के नीचे जीवन-यापन करने को मजबूर हैं। इसके विपरीत भारतीय संस्कृति में “हम” का भाव केंद्रीय है। इसी विचार के आधार पर उत्तरदायी राष्ट्र सूचकांक विकसित किया गया है।

सूचकांक के तीन मूल आयाम

उत्तरदायी राष्ट्र सूचकांक तीन प्रमुख आयामों पर आधारित है। पहला, आंतरिक उत्तरदायित्व, जो गरिमा, न्याय और नागरिक कल्याण का आकलन करता है। दूसरा, पर्यावरणीय उत्तरदायित्व, जो प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और जलवायु कार्यवाही का मूल्यांकन करता है। तीसरा, बाह्य उत्तरदायित्व, जो शांति, बहुपक्षीय सहयोग और वैश्विक स्थिरता में योगदान को मापता है।

यह सूचकांक पारंपरिक आर्थिक और सैन्य शक्ति आधारित मानकों से हटकर नैतिक शासन और सामाजिक कल्याण पर केंद्रित है। यह मूल्य आधारित और मानव केंद्रित विकास ढांचे को बढ़ावा देता है।

निष्कर्ष: वैश्विक शासन में भारतीय वैचारिक योगदान

उत्तरदायी राष्ट्र सूचकांक भारत की वैचारिक पहल है, जो वैश्विक शासन को नए नैतिक मानकों की ओर ले जाती है। यदि देश इस सूचकांक को अपनाते हैं, तो यह वैश्विक स्तर पर एक क्रांतिकारी परिवर्तन ला सकता है। यह सूचकांक नैतिक नेतृत्व, सतत विकास और वैश्विक उत्तरदायित्व के लिए एक नया मानक प्रस्तुत करता है।

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