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अरावली पर SC के आदेश को गलत तरीके से क्यों समझा जा रहा है ?

अरावली पर सर्वोच्च न्यायालय के 20 नवंबर 2025 के आदेश के बाद सोशल मीडिया पर #SaveAravalli अभियान के माध्यम से व्यापक जनचिंता सामने आई है। अरावली की पारिस्थितिक महत्ता को देखते हुए यह चिंता स्वाभाविक है। किंतु यह धारणा कि न्यायालय ने पर्यावरणीय संरक्षण को कमजोर किया है। या बड़े पैमाने पर खनन का मार्ग प्रशस्त किया है। ये कानूनी रूप से गलत है। और न्यायालय के आदेश के वास्तविक उद्देश्य को धुंधला करती है।

आरवली पर सुप्रीम कोर्ट का आदेश वास्तव में क्या कहता है?

वास्तव में, यह आदेश किसी भी प्रकार से खनन को बढ़ावा नहीं देता। इसके विपरीत, सर्वोच्च न्यायालय ने नियामकीय नियंत्रण को और सख्त किया है। आदेश के तहत अरावली क्षेत्र में नए खनन पट्टों पर पूर्ण विराम लगाया गया है। जब तक कि पूरे परिदृश्य के लिए एक सतत खनन प्रबंधन योजना – (Management Plan for Sustainable Mining – MPSM) तैयार नहीं हो जाती। यह योजना भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद (ICFRE) द्वारा पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के अधीन, वैज्ञानिक एवं संस्थागत प्रक्रिया के माध्यम से तैयार की जानी है। इसे किसी भी दृष्टि से खनन समर्थक कदम नहीं कहा जा सकता।

इस आदेश का सबसे अधिक विवादित पहलू — “स्थानीय सापेक्ष ऊँचाई से 100 मीटर” का मानदंड — व्यापक रूप से गलत समझा गया है। यह मानदंड पारिस्थितिक मूल्यांकन नहीं – बल्कि खनन नियमन हेतु एक परिचालनात्मक मानचित्रण उपकरण है। अतीत में विभिन्न राज्यों और विभागों द्वारा अरावली की भिन्न-भिन्न और अस्पष्ट परिभाषाओं के कारण अवैध खनन को बढ़ावा मिला। एक समान, मानचित्र-सत्यापन योग्य मानदंड का उद्देश्य इसी प्रशासनिक अस्पष्टता को समाप्त करना है।

यह समझना भी आवश्यक है कि खनन नियमन के लिए अपनाई गई परिभाषा अन्य पर्यावरणीय सुरक्षा व्यवस्थाओं को समाप्त नहीं करती। वन भूमि, वन्यजीव गलियारे, रिज क्षेत्र, पारिस्थितिकी-संवेदनशील क्षेत्र (ESZ) तथा संरक्षित क्षेत्र आज भी अपने-अपने वैधानिक कानूनों के अंतर्गत संरक्षित हैं। यह कहना कि 100 मीटर से कम ऊँचाई वाले सभी क्षेत्र अब संरक्षण से बाहर हो गए हैं – तथ्यात्मक रूप से गलत है।

सोशल मीडिया पर किए गए सभी दावे अनुमान आधारित

सोशल मीडिया पर सबसे अधिक प्रचारित दावा — कि “अरावली का 90 प्रतिशत क्षेत्र खनन के लिए खोल दिया गया है” — कोई न्यायिक निष्कर्ष नहीं, बल्कि अनुमान पर आधारित प्रचार है। वास्तविक सीमांकन भारतीय सर्वेक्षण विभाग (Survey of India) द्वारा किए जाने वाले मानचित्रण तथा MPSM में निर्धारित ज़ोनिंग पर निर्भर करेगा। इन प्रक्रियाओं के पूर्ण होने से पहले ऐसे संख्यात्मक दावे अटकलबाज़ी से अधिक कुछ नहीं हैं।

कुछ आलोचक यह भी कहते हैं कि सर्वोच्च न्यायालय ने 2010 के आसपास दिए गए अपने पूर्व आदेशों से विचलन किया है। किंतु न्यायालय परिस्थितियों के अनुरूप निर्णय करता है। वर्ष 2025 में न्यायालय के समक्ष कई राज्यों में फैला अवैध खनन और कमजोर प्रवर्तन की समस्या थी। ऐसे में एक समान परिभाषा, नए पट्टों पर रोक और परिदृश्य-स्तरीय योजना का निर्देश नियमन को मजबूत करने का प्रयास है, न कि उसे शिथिल करने का।

अरावली पर ऐतिहासिक परिदृश्य

इतिहास भी इसी दृष्टिकोण की पुष्टि करता है। एम.सी. मेहता बनाम भारत संघ मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने अरावली और रिज क्षेत्र में खनन तथा भूजल दोहन पर रोक लगाई थी, यह स्वीकार करते हुए कि यह क्षेत्र एक महत्वपूर्ण पारिस्थितिक अवरोध है। न्यायालय की संस्थागत प्रवृत्ति अरावली के संदर्भ में सदैव संरक्षणपरक रही है।

अंततः, यह आशंका कि यह आदेश निर्माण गतिविधियों को अनियंत्रित कर देगा, विभिन्न कानूनी क्षेत्रों को आपस में ग़लत तरीके से जोड़ती है। भूमि उपयोग नियोजन, वन स्वीकृतियाँ, ESZ मानदंड और पर्यावरणीय प्रभाव आकलन आज भी यथावत लागू हैं। नवंबर का आदेश इन व्यवस्थाओं में कोई परिवर्तन नहीं करता।

अब असली परीक्षा नारेबाज़ी में नहीं, बल्कि कार्यान्वयन में है। पारदर्शी मानचित्रण, सुदृढ़ ज़ोनिंग और कड़े प्रवर्तन से ही अरावली का वास्तविक संरक्षण सुनिश्चित होगा। भ्रामक सूचनाएँ, चाहे वे सद्भावना से ही क्यों न फैलाई गई हों, इस जवाबदेही से ध्यान भटकाने का जोखिम रखती हैं।

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