भारतीय राजनीति में बारह वर्ष कोई छोटा समय नहीं होता। इस अवधि में अनेक नेता उभरते हैं, अनेक दल बिखर जाते हैं, अनेक नारे पैदा होते हैं और इतिहास के कूड़ेदान में फेंक दिए जाते हैं। लेकिन कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं जो केवल सरकार नहीं चलाते, बल्कि अपने समय की राजनीति की धुरी बन जाते हैं।
आज जब नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार के बारह वर्ष पूरे हो रहे हैं, तब एक बार पीछे मुड़कर देखना चाहिए। इन बारह वर्षों में उनके समर्थकों ने उन्हें अनेक नाम दिए, विरोधियों ने उन पर असंख्य आरोप लगाए, उनके राजनीतिक अंत की भविष्यवाणियाँ अनगिनत बार हुईं, उनके विरुद्ध आंदोलन खड़े किए गए, देश और विदेश में उनके खिलाफ अभियान चलाए गए, लेकिन एक तथ्य आज भी अटल खड़ा है—भारतीय राजनीति का केंद्र तब भी नरेंद्र मोदी थे और आज भी नरेंद्र मोदी ही हैं।
पिछले एक दशक से अधिक समय से भारतीय राजनीति को देखिए। एक सत्य बार-बार सामने आता है। जो लोग केवल मोदी-विरोध को अपनी राजनीति का आधार बनाकर चले, वे धीरे-धीरे अप्रासंगिक होते गए। जो उनके पराभव की प्रतीक्षा कर रहे थे, वे निराश होकर किनारे लग गए। जो स्वार्थवश निकट आए, समय आने पर अलग कर दिए गए। जो चाटुकारिता के सहारे लाभ की आशा लगाए बैठे थे, वे भी अंततः नए आश्रय खोजने लगे।
इतने विशाल, विविधताओं से भरे, भाषाओं, जातियों, पंथों और क्षेत्रीय आकांक्षाओं से निर्मित इस जटिल देश में नरेंद्र मोदी आज भी राष्ट्रीय राजनीति के निर्विवाद केंद्र में खड़े हैं। लगातार तीन बार जनता का जनादेश प्राप्त करने के बाद वे भारतीय राजनीति के सबसे प्रभावशाली संदर्भ-बिंदु बन चुके हैं। उनके समर्थकों की राजनीति भी उन्हीं के इर्द-गिर्द घूमती है और विरोधियों की राजनीति भी। विपक्ष के पास मोदी को हटाने का नारा तो है, लेकिन मोदी का विकल्प नहीं; विरोध का एजेंडा है, लेकिन वैकल्पिक नेतृत्व नहीं।
राहुल गांधी और उनके जैसे अनेक लोगों को आज भी यह भ्रम है कि सड़क पर भीड़ खड़ी करके, आंदोलन खड़ा करके या अराजकता पैदा करके सत्ता परिवर्तन किया जा सकता है। यदि ऐसा होना होता तो सीएए आंदोलन से कुछ न कुछ परिणाम निकल आता, किसान आंदोलन से कुछ न कुछ परिणाम निकल आता। लेकिन हुआ क्या? मोदी वहीं खड़े रहे और आंदोलन अपने ही अंतर्विरोधों में उलझते चले गए।
वास्तव में विपक्ष की सबसे बड़ी भूल यह है कि वह मोदी की राजनीतिक शैली को समझे बिना उनसे संघर्ष करना चाहता है। उसे लगता है कि प्रधानमंत्री की कमजोर नस स्ट्रीट पॉवर है। उसे लगता है कि कुछ सड़कें घेर देने, कुछ नारे लगा देने और कुछ दिनों तक अराजकता का वातावरण बना देने से सरकार दबाव में आ जाएगी। जबकि वास्तविकता इसके बिल्कुल विपरीत है।
मोदी का सबसे बड़ा राजनीतिक ब्रह्मास्त्र है, प्रतिक्रिया न देना।
विरोधी उनकी प्रतिक्रिया का इंतज़ार करते रहते हैं, आंदोलनकारी उनकी प्रतिक्रिया का इंतज़ार करते रहते हैं, लेकिन जब प्रतिक्रिया नहीं मिलती तो वही लोग धीरे-धीरे अपनी सीमाएँ लाँघने लगते हैं। फिर जनता स्वयं निर्णय करती है कि कौन संयमित है और कौन अराजक। जो लोग सरकार से हर समय लाठी, गिरफ्तारी और दमन की अपेक्षा करते हैं, वे राजनीति का मूल सिद्धांत नहीं समझते।
लोकतंत्र में किसी नेता की सबसे बड़ी सजा जेल नहीं होती, बल्कि राजनीतिक अप्रासंगिकता होती है। किसी नेता को इस स्थिति में पहुँचा देना कि जनता उसे गंभीरता से लेना बंद कर दे, उससे मुँह मोड़ ले और उसके आरोपों पर ध्यान देना बंद कर दे, यही सबसे बड़ी राजनीतिक हार होती है। मोदी अपने धैर्य से यही करके दिखाते हैं।
बहुत से लोगों को यह भ्रम रहता है कि सरकार कार्रवाई नहीं कर रही क्योंकि सरकार कमजोर है। जबकि अनेक बार सरकार कार्रवाई नहीं करती क्योंकि वह जानती है कि समय उसके पक्ष में काम कर रहा है। जो लोग राज्य की शक्ति पर प्रश्न उठाते हैं, उन्हें केवल इतना देख लेना चाहिए कि जब भारत सरकार ने नक्सलवाद के विरुद्ध निर्णायक अभियान चलाने का निश्चय किया तो वर्षों तक जंगलों में समानांतर सत्ता चलाने वाले संगठन अचानक वार्ता की अपील करने लगे। इससे यह स्पष्ट होता है कि जब राज्य अपनी पूरी शक्ति से खड़ा होता है तो परिणाम भी निर्णायक होते हैं।
यही कारण है कि यह मान लेना कि भारत जैसे लोकतंत्र में कोई समूह केवल सड़क की शक्ति के बल पर सत्ता परिवर्तन कर देगा, भारतीय राज्य और समाज दोनों को न समझना है। खालिस्तानी किसान आंदोलन हो या सीएए विरोध, अंततः व्यापक समाज ने अपना निर्णय स्वयं दिया। जो लोग अपनी स्ट्रीट पॉवर दिखाकर राष्ट्रीय राजनीति की दिशा बदलना चाहते थे, वे स्वयं राजनीतिक रूप से सीमित होते चले गए।
यहीं मोदी की राजनीति और उनके विरोधियों की राजनीति में मूल अंतर है। विरोधी तत्काल परिणाम चाहते हैं, मोदी दीर्घकालिक परिणाम देखते हैं। विरोधी आज का शोर सुनते हैं, मोदी दस वर्ष बाद की राजनीति देखते हैं। विरोधी कैमरे की ओर देखते हैं, मोदी मतदाता की ओर देखते हैं।
आज विपक्ष की सबसे बड़ी समस्या यह नहीं है कि वह चुनाव हार रहा है। उसकी सबसे बड़ी समस्या यह है कि वह यह समझ नहीं पा रहा कि मोदी जीतते कैसे हैं। इसलिए उसका ध्यान खेल जीतने से अधिक रेफरी पर रहता है। उसे लगता है कि यदि वह मैदान नहीं जीत सकता तो मैदान की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगा दे। कभी उसे विदेशी समर्थन में आशा दिखाई देती है, कभी उसे सड़क पर खड़ी भीड़ में भविष्य दिखाई देता है। लेकिन भारत का लोकतंत्र किसी विदेशी शक्ति, एनजीओ, मीडिया नैरेटिव या टीवी स्टूडियो से नहीं, बल्कि करोड़ों मतदाताओं के विश्वास से चलता है।
यही कारण है कि आज दुनिया के रणनीतिक और सुरक्षा विशेषज्ञ भी भारत को केवल एक क्षेत्रीय शक्ति नहीं, बल्कि वैश्विक संतुलनकर्ता के रूप में देखने लगे हैं। अमेरिकी सैन्य विश्लेषक डगलस मैकग्रेगर ने भी ईरान संकट के संदर्भ में कहा कि यदि अमेरिका को कोई विश्वसनीय मध्यस्थ चाहिए तो उसे नरेंद्र मोदी से बात करनी चाहिए, क्योंकि भारत के संबंध इज़राइल, ईरान, अमेरिका और चीन, सभी से संवाद की स्थिति में हैं। उनका कहना था कि भारत एक ऐसा तटस्थ राष्ट्र है जिसका कद, शक्ति, प्रभाव और वैश्विक महत्व लगातार बढ़ रहा है और दुनिया को इसे समस्या नहीं बल्कि अवसर के रूप में देखना चाहिए। यह केवल नरेंद्र मोदी की नहीं, बल्कि भारत की बढ़ती वैश्विक प्रतिष्ठा की स्वीकारोक्ति है।
जो लोग आज भी यह सपना देख रहे हैं कि वे सड़क पर बहुमत का फैसला बदल देंगे, भीड़ के बल पर लोकतांत्रिक जनादेश को पलट देंगे या अराजकता के माध्यम से सत्ता परिवर्तन कर देंगे, उन्हें भारतीय लोकतंत्र की प्रकृति को समझना चाहिए। यह देश अपने संविधान, अपनी लोकतांत्रिक संस्थाओं और जनता के जनादेश से चलेगा। सरकार बदलनी है तो चुनाव जीतिए, असहमति है तो लोकतांत्रिक संघर्ष कीजिए, लेकिन बहुमत का निर्णय सड़क पर लिखने का प्रयास कभी सफल नहीं होगा।
नरेंद्र मोदी पर टिप्पणी करना आसान है, नरेंद्र मोदी का विरोध करना आसान है, लेकिन नरेंद्र मोदी को समझना आसान नहीं है। दुनिया के लोकतांत्रिक इतिहास में ऐसे उदाहरण बहुत कम मिलेंगे जहाँ किसी व्यक्ति ने दशकों तक समाज को जिया हो, संगठन को जिया हो, लंबे समय तक प्रशासन चलाया हो और फिर एक दशक से अधिक समय तक राष्ट्रीय राजनीति की केंद्रीय धुरी बना रहा हो।
बारह वर्ष बाद भी यदि समर्थकों की राजनीति मोदी के इर्द-गिर्द घूमती है, विरोधियों की राजनीति मोदी के इर्द-गिर्द घूमती है, चुनावी रणनीतियाँ मोदी के इर्द-गिर्द बनती हैं और राष्ट्रीय विमर्श मोदी के इर्द-गिर्द आकार लेता है, तो यह किसी संयोग का परिणाम नहीं है।
और यही कारण है कि आज भी भारतीय राजनीति का सबसे बड़ा सत्य एक ही है। समर्थन हो या विरोध, विमर्श का केंद्र अंततः नरेंद्र मोदी ही हैं।
लेखकअरविंद मोहन सिंह एक सामाजिक-राजनीतिक विश्लेषक, लेखक एवं डिजिटल रणनीतिकार हैं। एक्स पर @ArvindSinghUp के नाम से सक्रिय अरविंद राष्ट्रीय विमर्श, जनमत निर्माण और विशेष रूप से राजनीति पर अपनी पैनी टिप्पणियों और स्वतंत्र विश्लेषण के लिए पहचाने जाते हैं।





