करीब बीस वर्षों की लंबी बातचीत और कूटनीतिक प्रयासों के बाद भारत और यूरोपीय संघ (EU) के बीच मुक्त व्यापार समझौता (FTA) आखिरकार साकार हो गया है। इस समझौते को यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने “मदर ऑफ ऑल डील्स” यानी ‘सभी सौदों की जननी’ कहा है। यह बयान अपने आप में इस समझौते के महत्व को दर्शाता है। यह डील न सिर्फ भारत–EU संबंधों में एक नया अध्याय जोड़ती है, बल्कि आम भारतीय नागरिक, किसान, कारोबारी और उद्योग जगत के लिए भी बड़े फायदे लेकर आती है।
इस ऐतिहासिक समझौते के तहत भारत और यूरोपीय संघ के बीच व्यापार होने वाले 90 प्रतिशत से अधिक उत्पादों पर आयात शुल्क (टैरिफ) या तो पूरी तरह खत्म कर दिए जाएंगे या उनमें भारी कटौती की जाएगी। इसका सीधा असर रोज़मर्रा में इस्तेमाल होने वाले सामानों की कीमतों पर पड़ेगा। शराब, बियर, ऑलिव ऑयल, फ्रूट जूस, प्रोसेस्ड फूड, दवाइयां, मशीनरी और केमिकल उत्पाद जैसे कई सामान सस्ते होंगे, जिससे आम जनता की जेब पर बोझ कम होगा।
विशेषज्ञों के मुताबिक, इस डील के कारण भारत को सालाना अरबों रुपये के स्तर पर सस्ते आयात का लाभ मिलेगा। वहीं यूरोपीय आयोग का अनुमान है कि इस समझौते के चलते भारत द्वारा यूरोपीय उत्पादों पर लगाए जाने वाले टैरिफ में करीब 4 अरब यूरो (लगभग 4.7 अरब डॉलर) प्रतिवर्ष की कमी आएगी। इसका फायदा सीधे तौर पर उपभोक्ताओं और भारतीय उद्योगों को मिलेगा, जिन्हें बेहतर गुणवत्ता का सामान कम कीमत पर उपलब्ध होगा।
इस समझौते का एक अहम पहलू भारत के श्रम-प्रधान निर्यात क्षेत्रों को मिलने वाली राहत है। अमेरिका द्वारा लगाए गए ऊंचे टैरिफ के कारण भारतीय टेक्सटाइल, लेदर, मरीन प्रोडक्ट्स, जेम्स और ज्वेलरी जैसे सेक्टर दबाव में थे। अब EU द्वारा इन उत्पादों पर शुल्क घटाए जाने या हटाए जाने से भारतीय निर्यातकों को नया बाज़ार और स्थिर मांग मिलने की उम्मीद है। इससे लाखों लोगों के लिए रोज़गार के नए अवसर भी पैदा हो सकते हैं।
FTA के तहत भारत यूरोप से आने वाले ऑटोमोबाइल, मशीनरी और कृषि उत्पादों पर टैरिफ में बड़ी कटौती करेगा। वहीं यूरोपीय संघ भारतीय टेक्सटाइल, चमड़ा उत्पाद, समुद्री खाद्य पदार्थ, रत्न और आभूषण जैसे क्षेत्रों को अपने बाज़ार में बेहतर पहुंच देगा। इससे ‘मेक इन इंडिया’ और ‘लोकल टू ग्लोबल’ जैसे अभियानों को भी मजबूती मिलेगी।
व्यापारिक आंकड़ों पर नज़र डालें तो भारत फिलहाल यूरोपीय संघ का नौवां सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है। वर्ष 2024 में EU के कुल वस्तु व्यापार में भारत की हिस्सेदारी लगभग 2.4 प्रतिशत रही, जो अमेरिका, चीन और ब्रिटेन जैसे बड़े साझेदारों से कम है। लेकिन इसके उलट तस्वीर यह है कि यूरोपीय संघ भारत के सबसे बड़े व्यापारिक साझेदारों में से एक है और अमेरिका तथा चीन के बराबर की भूमिका निभाता है। यही कारण है कि यह समझौता भारत के लिए रणनीतिक रूप से बेहद अहम माना जा रहा है।
यूरोपीय संघ का अनुमान है कि इस FTA के लागू होने के बाद 2032 तक भारत को उसका निर्यात दोगुना हो सकता है। यूरोपीय आयोग के अनुसार, भारत यूरोपीय संघ को ऐसी टैरिफ रियायतें दे रहा है, जो उसने अपने किसी अन्य व्यापारिक साझेदार को अब तक नहीं दी हैं। इससे EU के लिए भारतीय बाज़ार में ऑटोमोबाइल, एग्री-फूड प्रोडक्ट्स, केमिकल्स, मशीनरी और एयरक्राफ्ट जैसे क्षेत्रों में अभूतपूर्व अवसर खुलेंगे।
विदेश नीति के स्तर पर यह समझौता केंद्र सरकार की बड़ी सफलता के रूप में देखा जा रहा है। बदलते वैश्विक भू-राजनीतिक माहौल में भारत ने अपने आर्थिक हितों की रक्षा करते हुए एक संतुलित और दूरदर्शी समझौता किया है। यह डील दर्शाती है कि भारत अब वैश्विक मंच पर सिर्फ एक उभरता हुआ बाज़ार नहीं, बल्कि एक मज़बूत और भरोसेमंद साझेदार के रूप में स्थापित हो चुका है।
कुल मिलाकर, भारत–EU मुक्त व्यापार समझौता सिर्फ आंकड़ों और टैरिफ तक सीमित नहीं है। यह आम जनता के लिए सस्ती चीज़ें, युवाओं के लिए रोज़गार के अवसर, उद्योगों के लिए नए बाज़ार और देश के लिए मज़बूत वैश्विक पहचान लेकर आता है। यही वजह है कि इस समझौते को भारत की आर्थिक और कूटनीतिक दिशा में एक ऐतिहासिक कदम माना जा रहा है—जिसका लाभ आने वाले वर्षों में हर वर्ग को महसूस होगा।






