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विश्व में शांति स्थापित करने हेतु भारतीय संस्कृति का उत्थान आवश्यक

भारतीय संस्कृति

भारतीय संस्कृति की झलक के सामाजिक जीवन में स्पष्ट रूप से दिखाई देती थी। कहा जाता है किमें समाज पूर्णतः एकरस था और उस समय। एक प्रसिद्ध कथा के माध्यम से इस बात को सरलता से समझा जा सकता है। सतयुग के खंडकाल में एक किसान ने अपनी ज़मीन बेची। जिस व्यक्ति ने वह ज़मीन खरीदी, उसे खुदाई के दौरान सोने के सिक्कों से भरा एक घड़ा मिला। वह व्यक्ति घड़ा लेकर ज़मीन के विक्रेता के पास पहुँचा और बोला कि चूँकि उसने केवल ज़मीन खरीदी है, इसलिए इन सोने के सिक्कों पर उसका कोई अधिकार नहीं है और यह घड़ा विक्रेता को ही रखना चाहिए।

ज़मीन के विक्रेता ने भी यह कहते हुए घड़ा लेने से इनकार कर दिया कि ज़मीन बिक चुकी है, इसलिए बाद में प्राप्त होने वाली किसी भी वस्तु पर अब उसका अधिकार नहीं बनता। जब दोनों के बीच कोई समाधान नहीं निकला, तो वे घड़ा लेकर राजा के पास पहुँचे। राजा ने भी राज्य के खज़ाने में उसे जमा करने से यह कहते हुए मना कर दिया कि बिना किसी वैधानिक कारण के प्राप्त धन को राज्य नहीं ले सकता। यह घटना उस कालखंड की नैतिक चेतना को दर्शाती है, जहाँ जो वस्तु अपनी नहीं होती थी, उसे रखने का विचार भी अस्वीकार्य था।

सतयुग के बाद त्रेतायुग आया, जहाँ सामाजिक समरसता में कुछ ह्रास दिखाई देता है। इसी युग में रावण द्वारा माता सीता का अपहरण हुआ। प्रभु श्रीराम ने आदिवासियों और वानरों को संगठित कर समरसता का भाव जागृत किया और रावण के अत्याचार का अंत किया। त्रेतायुग का यह प्रसंग यह संदेश देता है कि जब समाज संगठित होता है, तो कोई भी बुराई टिक नहीं सकती।

त्रेतायुग के बाद द्वापर युग आया, जहाँ समाज ही नहीं बल्कि परिवारों के भीतर भी एकता टूटने लगी। कौरवों द्वारा पांडवों को केवल पाँच गाँव देने से इनकार करना इसी विघटन का प्रतीक था, जिसका परिणाम महाभारत युद्ध के रूप में सामने आया। यह युग सत्ता, अहंकार और स्वार्थ की परिणति को दर्शाता है।

आज का कलियुग अपने आप में अलग ही तस्वीर प्रस्तुत करता है। पश्चिमी समाजों में व्यक्ति केवल अपने सुख और स्वार्थ तक सीमित होता दिखाई देता है। परिवार, समाज और राष्ट्र के प्रति ज़िम्मेदारी का भाव कमजोर पड़ता जा रहा है। नागरिक आत्मकेंद्रित होते जा रहे हैं और सामूहिक चेतना का क्षरण स्पष्ट दिखाई देता है।

भारतीय संस्कृति में सामाजिक समरसता को सर्वोच्च स्थान दिया गया है। यहाँ व्यक्ति स्वयं से आगे परिवार, समाज, राष्ट्र और संपूर्ण विश्व को एक इकाई के रूप में देखता है। “वसुधैव कुटुंबकम”, “सर्वे भवन्तु सुखिनः” और “सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय” जैसे सूत्र इसी व्यापक दृष्टि को अभिव्यक्त करते हैं। आज जब विश्व अशांति, युद्ध और आंतरिक संघर्षों से जूझ रहा है, तब भारतीय संस्कृति का यह जीवन दर्शन वैश्विक शांति की एकमात्र आशा बनकर उभरता है।

विवेकानंद केंद्र, कन्याकुमारी से जुड़ी आदरणीय दीदी निवेदिता रघुनाथ भिड़े ने अपनी पुस्तक “भारतीय संस्कृति – चुनौतियाँ एवं संभावनाएँ” में भारतीय जीवन दर्शन को सात्विक ज्ञान से जोड़ा है। उनके अनुसार, जिस ज्ञान के माध्यम से साधक विभक्त प्राणियों में एक अविनाशी और अविभाज्य भाव को देखता है, वही सात्विक ज्ञान है। भारतीय संस्कृति ईश्वर, मानव और सृष्टि को अलग नहीं मानती, बल्कि उन्हें एकात्म रूप में देखती है।

इसके विपरीत, जहाँ प्राणियों को अलग-अलग रूपों में देखा जाता है, वह राजस ज्ञान कहलाता है। वहीं, जो ज्ञान केवल एक ही कर्म या शरीर तक सीमित हो जाए और तर्क व तत्त्व से रहित हो, उसे तामसिक ज्ञान कहा गया है। आधुनिक पूँजीवाद, कम्युनिज़्म, नक्सलवाद, साम्यवाद, मार्क्सवाद और माओवाद जैसे विचार इसी तामसिक दृष्टि से प्रेरित माने जाते हैं।

भारतीय संस्कृति का मूल स्वर सामाजिक समरसता, संगठन और एकात्मता है। यही जीवन दर्शन न केवल भारत को दिशा देता रहा है, बल्कि आज के वैश्विक संकटों के समाधान की क्षमता भी रखता है।

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