आज राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपनी स्थापना के 100 वर्ष पूर्ण कर लिए हैं। यदि हम संघ की इन 100 वर्षों की यात्रा पर दृष्टि डालें तो स्पष्ट होता है कि संघ के स्वयंसेवकों ने जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में विचार और क्रियाशीलता के स्तर पर सक्रिय योगदान दिया है। वे अनेक क्षेत्रों में परिवर्तन के वाहक भी बने हैं।
प्रारम्भ में सीमित दायरे में चलने वाला संघ कार्य समय के साथ व्यापक होता गया है। समाज की विभिन्न आवश्यकताओं को समझते हुए स्वयंसेवक विविध आयामों में अपने सहयोगियों के साथ सक्रिय रूप से कार्य करते रहे हैं। परिणामस्वरूप संघ के उद्देश्य के अनुरूप देश में हिंदुत्व के जागरण की दिशा में विशेष प्रगति हुई है।
हिंदुत्व के जागरण से समाज में जाति, वर्ग, भाषा आदि के आधार पर होने वाले अनेक प्रकार के भेदभाव धीरे धीरे कम होने लगे हैं।
हिंदुत्व जागरण और सामाजिक आत्मविश्वास
श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति आंदोलन, अयोध्या में श्रीरामलला की प्राण प्रतिष्ठा, कुम्भ जैसे विराट आयोजन ऐसे अनेक अवसर रहे हैं जहां हिंदू समाज का एक संगठित, भव्य और उच्च आदर्शों से युक्त स्वरूप सामने आया है।
इन आयोजनों ने समाज में आत्मविश्वास जगाने का कार्य किया है। आज लोगों में अपने धर्म, परम्परा और सांस्कृतिक मूल्यों के प्रति नया विश्वास दिखाई देता है।
एक समय था जब सार्वजनिक जीवन में हिंदू समाज की कमियों को ही उजागर किया जाता था, जिससे अनेक लोग हिंदुत्व की अच्छाइयों को पहचान नहीं पाते थे। किंतु अब स्थिति बदल रही है। लोग अपने पूर्वजों के धर्म और परम्पराओं को महत्व देने लगे हैं।
आज बच्चों के नामकरण से लेकर विवाह पद्धति तक में हिंदू संस्कारों का समावेश बढ़ रहा है और घर की परम्पराओं को आदरपूर्वक अपनाया जा रहा है।
संस्कारवान पीढ़ी का निर्माण
इस सम्पूर्ण प्रक्रिया का उद्देश्य एक सच्चरित्र, प्रामाणिक और संस्कारवान पीढ़ी का निर्माण करना है। ऐसी पीढ़ी समाज का वातावरण सुधार कर घर और समाज में सुख शांति स्थापित कर सकती है।
इसीलिए इन मूल्यों और संस्कारों को महत्व देने तथा उन्हें अपने जीवन में उतारने के प्रयास आज घर घर में होने लगे हैं। लोग ऐसे मंचों और माध्यमों से जुड़ने का प्रयास कर रहे हैं जो इस दिशा में मार्गदर्शन प्रदान करते हैं।
संघ को भी लोग इस दृष्टि से एक महत्वपूर्ण माध्यम मानने लगे हैं और विश्वासपूर्वक संघ से जुड़ने का उत्साह दिखा रहे हैं।
विश्वगुरु बनने की दिशा में भारत
जैसे जैसे हिंदुत्व पर विश्वास बढ़ रहा है वैसे वैसे भारत के प्रति श्रद्धा और विश्वास भी व्यापक और गहरा हो रहा है। संघ का मानना है कि “वसुधैव कुटुम्बकम्” के आदर्श पर चलकर भारत न केवल अपने समाज को सशक्त करेगा बल्कि पूरी दुनिया को शांति, सद्भाव और सहयोग का संदेश देकर विश्वगुरु की भूमिका निभाएगा।
यह तभी संभव है जब भारतीय समाज में सकारात्मक परिवर्तन आए।
पंच परिवर्तन कार्यक्रम का उद्देश्य
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष के अवसर पर समाज में व्यापक परिवर्तन लाने के उद्देश्य से एक विशेष अभियान चलाया जा रहा है जिसे “पंच परिवर्तन” कार्यक्रम कहा गया है।
इस कार्यक्रम का आह्वान परम पूजनीय सरसंघचालक श्री मोहन भागवत द्वारा किया गया है ताकि अनुशासन और देशभक्ति से ओतप्रोत युवा वर्ग राष्ट्र निर्माण की दिशा में सक्रिय भूमिका निभाए।
पंच परिवर्तन कार्यक्रम के अंतर्गत समाज में पांच प्रमुख क्षेत्रों पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है:
- नागरिक कर्तव्यों के प्रति जागरूकता
- पर्यावरण संरक्षण के प्रति सजगता
- स्वदेशी उत्पादों के उपयोग को बढ़ावा
- कुटुम्ब प्रबोधन के माध्यम से पारिवारिक मूल्यों को मजबूत करना
- सामाजिक समरसता को सुदृढ़ करना
कुटुम्ब प्रबोधन का महत्व
पंच परिवर्तन के अंतर्गत कुटुम्ब प्रबोधन एक महत्वपूर्ण विषय है। इसके लिए आवश्यक है कि परिवारों में संवाद, संस्कार और सकारात्मक वातावरण विकसित किया जाए।
प्रत्येक घर में सप्ताह में कम से कम एक बार पूजा या धार्मिक आयोजन हो। परिवार के सभी सदस्य एक साथ बैठकर महापुरुषों के जीवन और उनके आदर्शों पर चर्चा करें। बच्चों को संस्कारित वातावरण प्रदान किया जाए।
परिवार में नित्य संवाद, संवेदनशीलता और संस्कारित व्यवहार का वातावरण बने जिससे समाज सेवा की भावना भी विकसित हो।
सामाजिक समरसता की आवश्यकता
समाज में मंदिर, पानी और श्मशान के संबंध में यदि कहीं भेदभाव शेष है तो उसे समाप्त करना चाहिए।
त्योहारों के अवसर पर विभिन्न समाजों के लोग एक दूसरे के घर जाएं, साथ बैठकर चाय पान करें और सामाजिक संबंधों को मजबूत करें। इससे समाज में भाईचारा और समरसता की भावना मजबूत होगी।
पर्यावरण संरक्षण की जिम्मेदारी
पर्यावरण संरक्षण भी पंच परिवर्तन का महत्वपूर्ण भाग है। इसके लिए प्रत्येक व्यक्ति को अपने घर से ही शुरुआत करनी चाहिए।
पानी की बचत करना, सिंगल यूज प्लास्टिक का उपयोग कम करना और घर आंगन तथा आसपास हरियाली बढ़ाना छोटे लेकिन प्रभावी कदम हो सकते हैं। यदि समाज का प्रत्येक व्यक्ति इस दिशा में प्रयास करे तो पर्यावरण संरक्षण को मजबूत आधार मिल सकता है।
स्वदेशी से आत्मनिर्भर भारत
स्वदेशी का आचरण स्वनिर्भरता और स्वावलंबन को बढ़ाता है। देश का पैसा देश में ही लगे और देश में रोजगार बढ़े इसके लिए स्वदेशी उत्पादों का उपयोग बढ़ाना आवश्यक है।
इसलिए प्रत्येक नागरिक को अपने घर से ही स्वदेशी उत्पादों के उपयोग की शुरुआत करनी चाहिए।
सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ जागरूकता
समाज में व्याप्त कुरीतियों के उन्मूलन के लिए सामूहिक प्रयास आवश्यक हैं। विशेष रूप से युवाओं में नशे की प्रवृत्ति को समाप्त करने, मृत्यु भोज जैसी परंपराओं को रोकने और दहेज जैसी कुप्रथाओं के विरुद्ध समाज को जागरूक करना होगा।
जब समाज सजग होगा और नागरिक अपने कर्तव्यों का पालन करेंगे तब राष्ट्र मजबूत बनेगा।
हिंदुत्व आधारित जीवन दृष्टि
संघ की दृष्टि स्पष्ट है कि सम्पूर्ण भारत की पहचान जिस आध्यात्मिक, एकात्म और सर्वांगीण जीवन दृष्टि से है उसे विश्व हिंदुत्व या हिंदू जीवन दृष्टि के रूप में जानता है।
उसी हिंदुत्व को जागृत कर सम्पूर्ण समाज को एक सूत्र में जोड़ने और एक गुणवान, संगठित समाज के निर्माण का कार्य वर्ष 1925 में प्रारम्भ हुआ था और यह कार्य आज भी निरंतर जारी है तथा भविष्य में भी जारी रहेगा।






