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लालू यादव का K Kamraj Plan बना परिवार की टूट का कारण?

कहते हैं कि इतिहास खुद को दोहराता है। दिल्ली की सियासी जमीन पर एक पिता ने अपनी पुत्री को अपनी विरासत सौंपने के लिए एक व्यक्ति का चुनाव किया। उस व्यक्ति ने यह तय किया कि पार्टी के संगठन को मजबूत करने के नाम पर ओल्ड गार्ड्स की विदाई का रास्ता तैयार हो। इस बड़े फैसले ने 6 केंद्रीय मंत्रियों और 6 मुख्यमंत्रियों की कुर्सी खा ली। और पहली बार सरकार को संसद में अविश्वास प्रस्ताव का भी सामना करना पड़ा। लेकिन फिर भी यह चलता रहा। बाहरी तौर पर यह दिखाया गया कि इससे पार्टी की छवि बदलेगी और संगठन मजबूत होगा। लेकिन असली मकसद था अपनी पुत्री के राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों की भ्रूण हत्या। जिसने भारत की उपजाऊ राजनीतिक जमीन पर परिवारवाद का ऐसा बीज रोपा जिसकी फसल आज तक उस महान नेता के परिवार को वरदान के रूप में अनुग्रहित करती रही। और वही फसल आज तक भारतीय नागरिकों के लिए अभिशाप का दंश बनी हुई है।

यह घटना भारत के राजनीतिक इतिहास में परिवारवाद की जड़ें तैयार करती है। और बताती है कि कैसे ओल्ड गार्ड्स हटाए जाते हैं ताकि “युवा तुर्क” के रास्ते में कोई बाधा न बने।यह महान प्लान इतिहास के पन्नों में कामराज प्लान के रूप में दर्ज है। इसकी नींव तो पंडित नेहरू ने इंदिरा की राजनीतिक गोटियां सेट करने के लिए डाली। लेकिन उसका प्रयोग आज भी पंडित नेहरू की कांग्रेस के राजनीतिक विरोधी, सामंतवाद और परिवारवाद के खिलाफ कथित लड़ाई लड़ने वाले – कथित सामाजिक न्याय के मसीहा करते रहे हैं।

ताजा मामला लालू परिवार से है। अंदर की फाइल में सारा कंटेंट ऊपर की तरह, बस आगे का नेम स्टिकर बदल गया है। कामराज प्लान के ऊपर एक स्टिकर चिपकाकर उस पर लिखा गया है प्लान – संजय यादव

संजय यादव की एंट्री और RJD के भीतर उनकी मजबूती

2012 में दिल्ली में काम कर रहे संजय यादव कैसे इतने महत्वपूर्ण हो जाते हैं कि सभी दरबारी पत्रकार उन्हें राजद का ‘चाणक्य’ तक घोषित कर चुके थे? जीत का सेहरा भले उनके सिर पर नहीं बंधा। लेकिन हार की जवाबदेही भी खुले रूप से स्वीकार न करना संजय यादव की राजद के भीतर की पैठ को बताता है।

लालू यादव को 2013 के दौरान सजा सुनाई जाती है और उन्हें जेल जाना पड़ता है। पता सिर्फ लालू यादव का नहीं बदलता, संजय यादव का भी बदलता है। तेजस्वी उन्हें फुल-टाइम सलाहकार के रूप में पटना ले जाते हैं। 2015 बिहार विधानसभा चुनाव JDU ने राजद गठबंधन के साथ मिलकर लड़ा था। उसी दौरान संघ सरसंघचालक मोहन भागवत का आरक्षण पर दिया एक बयान काफी सुर्खियों में आया था। जिसे तोड़-मरोड़कर राजद ने पेश किया था। यह बयान बिहार विधानसभा चुनाव में ‘गेम चेंजर’ साबित हुआ और 2010 में मृत्यु-शैया पर पड़ी राजद को संजीवनी मिली। राजद इन चुनावों में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी।सरसंघचालक मोहन भागवत के इस बयान को लालू के संज्ञान में संजय यादव लेकर आते हैं। और यहीं से संजय यादव तेजस्वी के करीबी से लालू के करीबी होने की यात्रा पूरी करते हैं।

तेजस्वी, लालू और संजय: तीन कोणों में बढ़ती शक्ति-संरचना

संजय को उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव का निजी सचिव बनाया जाता है। अब तक भले ही राजद की कमान लालू यादव के हाथों में नजर आ रही हो। लेकिन सामंतवाद का कथित धुर-विरोधी नेता अपनी ‘इंदिरा’ का चुनाव भी कर चुका होता है और ‘कामराज’ का भी।

संजय यादव बिना लालू यादव के शह के रघुवंश प्रसाद सिंह जैसे दिग्गज नेता को पार्टी छोड़ने पर मजबूर नहीं कर सकते। रघुवंश बाबू ने अपने अंतिम समय में लालू यादव का त्याग किया। लालू यादव के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने वाले नेता उनसे अलग होते रहे। और यह सब लालू यादव की मर्ज़ी के बिना संभव नहीं था। चाहे रामकृपाल यादव हों या पिछले एक वर्ष से राजद से दूर चल रहे जगदानंद सिंह। जैसे-जैसे संजय का कद बढ़ा, लालू के बूढ़े शेर विदा होते गए।

2019 की हार, 2020 की जीत और परिवार में दरार

2019 के लोकसभा चुनाव में राजद की करारी हार हुई और पहली बार तेजस्वी के नेतृत्व पर सवाल उठने लगे। लालू के संरक्षण ने तेजस्वी को बचा तो लिया। और 2020 के चुनाव में मिली सफलता के बाद संजय को पार्टी में और अधिक शक्ति मिली।

लेकिन इसी बीच संजय यादव के प्रभाव ने ही परिवार को तोड़ने की प्रक्रिया शुरू कर दी। तेजप्रताप यादव द्वारा पहली बार संजय के खिलाफ बिगुल फूंका गया और यह संघर्ष यहीं नहीं रुका। अब्दुल बारी सिद्दीकी, जगदानंद सिंह जैसे बड़े नेताओं को दरकिनार कर संजय को 2024 में राज्यसभा भेजा गया। हरियाणा का व्यक्ति बिहार की एक क्षेत्रीय पार्टी से राज्यसभा सांसद बन गया।

2025 चुनाव से पहले RJD की कमान का पूरा नियंत्रण

2025 के विधानसभा चुनाव से पूर्व ही संजय ने अपने खिलाफ आवाज उठा चुके तेजप्रताप को ‘ठिकाने’ लगा दिया। रोहिणी आचार्य के साथ चुनावी नतीजे से पूर्व हुआ विवाद यह दर्शा गया कि अब राजद और तेजस्वी का पूरा नियंत्रण संजय के पास है।

राजद को कवर करने वाले पत्रकार बताते हैं कि:

  • तेजस्वी किससे मिलेंगे, किससे नहीं यह संजय तय करते हैं
  • किस चैनल को इंटरव्यू देना है यह भी वही तय करते हैं
  • चुनाव की रणनीति से लेकर बैठक तक सब कुछ संजय नियंत्रित करते हैं.

राजद का कोई भी नेता बिना संजय का गेट पास लिए तेजस्वी या लालू से नहीं मिल सकता।

टिकट वितरण, गैर-बिहारी टीमें और काडर की उपेक्षा

स्थानीय कार्यकर्ता और पदाधिकारी संजय की उपेक्षा का शिकार हुए। चुनाव में काम करने के लिए गैर-बिहारी (मुख्यतः हरियाणा) टीमें बुलाई गईं। और सर्वे या टिकट बंटवारे में काडर को पूरी तरह से नजरअंदाज़ किया गया।

चुनावों में तेजस्वी को जीत का सपना दिखाकर राजद को एक ‘दुकान’ बनाया गया। और टिकटों की बंदरबांट शुरू हुई। सीएम का सपना दिखाकर सिर्फ खजाना भरा गया। कई नेताओं ने यह आरोप लगाए। सिटिंग विधायकों की भारी कटौती इसका प्रमाण है।

बाकी आप मदन शाह को तो भूले नहीं होंगे जिन्होंने संजय यादव के व्यापार का भांडा बीच चुनाव में फोड़ दिया था।

पेड PR तंत्र के सहारे खुद को बिहार का चाणक्य घोषित करवाने वाला हार की जिम्मेदारी तक नहीं ले पा रहा है। और अब तक उसका पद पर बने रहना यह बता रहा है कि तेजस्वी वो “गूंगी गुड़िया” हैं – जिसकी कमान संजय के हाथ में है।

कहा तो यह जाता है कि लालू अपने पुत्र को CM बनाने की चाहत में कामराज खड़ा कर बैठे। और बड़े बेटे की राजनीतिक महत्वाकांक्षा की कुर्बानी दे डाली। लेकिन यहां इस ‘कामराज’ ने पूरी पार्टी ही अपने इर्द-गिर्द कर डाली। गलती लालू की है, तेजस्वी की न तो ग्रूमिंग की, न ट्रेनिंग।

पंडित नेहरू की बेटी को पहले जवाहर के साथ राजनीति सीखने का मौका मिला। फिर शास्त्री जी का आशीर्वाद भी। जवाहर की भूमिका में लालू आते ही नहीं। और जो नितीश तेजस्वी के लिए शास्त्री बन सकते थे। तेजस्वी उन्हें अपने करीब रख ही नहीं पाए। निजी स्वार्थ के लिए लालू यादव ने पहले बिहार की। फिर परिवार की और अब पार्टी की बलि चढ़ा डाली।

जिन्हें लगता है कि 2015 और 2020 में राजद की बढ़त का श्रेय संजय को जाता है। वो भूल जाते हैं कि 2015 में नितीश ‘चाचा’ ने वेंटीलेटर पर पड़ी राजद को संजीवनी देने का काम किया। वहीं 2020 में चिराग पासवान की ‘क्रांति’ ने लालटेन की लौ जलाए रखी।

इसमें संजय सिर्फ वह भाग्यशाली व्यक्ति रहे जिसका मित्र सत्ता पर बैठने का स्वप्न पाले बैठा रहा। और उसका विश्वास संजय पर उसी तरह बना रहा जैसे दुर्योधन का कर्ण पर।

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